University Corner

Research

Vice-Chancellor

Prof. Piyushkant Dixit
“ स्वागताभिनन्दनम् ”

भारतभूमिभागे देवभूमेः उत्तराखण्डस्य परमपुनीतायां हरिद्वारनगर्यां स्थितस्य उत्तराखण्डसंस्कृतविश्वविद्यालयस्य सेवकाग्रगण्येन मया शिक्षाविदां, संस्कृतानुरागिणां, शिक्षकाणाम्, अन्तेवासिनां, प्राशासनिकाधिकारिणां कर्मचारिणां च प्रीतिप्रमुखवचनपूर्वम् अभिनन्दनं विदधता हर्षविशेषातिरेकः अनुभूयते।
नगाधिराजस्य हिमालयस्य भगवत्याः भागीरथ्याश्चास्मिन् राज्ये युगयुगान्तरेभ्यः संस्कृतस्य संस्कृतेश्च विमला धारा प्रवहमाना राराजते। भारतीया संस्कृतिः हिमालयस्य गंगायमुनयोश्च संस्कृतिः इति समुद्घोष्यते। अद्यतः एकादशवर्षपूर्वम् उत्तराखण्डराज्यस्य सर्वकारेण स्वीयां प्राचीनतमां प्रतिभूतिं संरक्षितुं संस्कृतसम्बद्धान् विविधान् समुज्ज्वलपक्षान् विश्वे जन-जनसमक्षं पूर्णया भव्यतया दिव्यतया च प्रकाशमानेतुमयं विश्वविद्यालयः संस्थापितः।
अस्माकं राज्यस्य राज्यपालाः माननीयाः डॉ0 कृष्णकान्तपालमहोदयाः मुख्यमन्त्रिणः, संस्कृतशिक्षामन्त्रिणः संस्कृतभाषां विश्वपटले त्वरितगत्या प्रतिष्ठापयितुं समीहन्ते। श्रद्धेयाः कुलाधिपतिमहोदयाः एतदर्थं विश्वप्रसिद्धस्यास्य विश्वविद्यालयस्य निरुपमां भूमिकां यथार्थतो निर्धारयितुं समुत्सुकाः सन्ति।
अस्मिन् संस्कृतविश्वविद्यालये एतत्सम्बद्धमहाविद्यालयेषु च कार्यरतान् प्राचार्यान्, शिक्षकान्, शिक्षणेतरकर्मकरान्, छात्रान् संस्कृत-संस्कृत्यनुरागशीलान् बन्धुबान्धवांश्च साग्रहं सविनयं चानुरुन्धे यत्ते स्वीयस्य पुरुषार्थस्य, परिश्रमस्य, योग्यतायाः साधनायाश्च बलेन संस्कृतस्य पताकां हिमाद्रेः सर्वोत्तुंगे शिखरे सुप्रतिष्ठापयेयुरिति।
“ स्वागताभिनन्दन ”

देवभूमि उत्तराखण्ड की परम पवित्र कुम्भ नगरी हरिद्वार में स्थित उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय की ओर से शिक्षाविदों, संस्कृतानुरागियों, शिक्षकों एवं छात्रों का हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन करते हुए मुझे अपार हर्ष हो रहा है।
नगाधिराज हिमालय एवं भगवती भागीरथी के इस राज्य में युगों-युगों से संस्कृत एवं संस्कृति की विमल-धारा प्रवाहित होती रही है। भारत की संस्कृति को हिमालय एवं गंगा की संस्कृति कहा जाता है। आज से ग्यारह वर्ष पूर्व उत्तराखंड राज्य की सरकार ने अपनी प्राचीन धरोहर की रक्षा तथा संस्कृत के विविध समुज्ज्वल पक्षों को विश्व में जन-जन के समक्ष पूर्ण भव्यता एवं दिव्यता के साथ प्रकाशित करने के लिये इस विश्वविद्यालय की स्थापना की थी।
हमारे राज्य के राज्यपाल माननीय डॉ. कृष्ण कान्त पॉल जी, मुख्यमंत्री तथा संस्कृत शिक्षा मंत्री संस्कृत-भाषा को विश्व पटल पर त्वरित-गति से प्रतिष्ठित करना चाहते हैं। श्रद्धेय कुलाधिपति महोदय एतदर्थ इस विश्व प्रसिद्ध विश्वविद्यालय की अप्रतिम भूमिका को यथार्थ स्वरुप देने के लिये समुत्सुक हैं।
इस विश्वविद्यालय एवं इससे सम्बद्ध महाविद्यालयों में कार्यरत प्राचार्यों, शिक्षकों, शिक्षकेतर कर्मचारियों, भविष्णु छात्रों एवं राज्य के संस्कृत, संस्कृति के प्रति अनुराग रखने वाले बन्धु-बान्धवों से मेरा साग्रह विनम्र अनुरोध है कि हम अपने पुरुषार्थ, परिश्रम, योग्यता एवं साधना से संस्कृत की पताका को हिमालय के सर्वोच्च शिखर पर सुप्रतिष्ठित करें।
"Welcome Message"

On behalf of the Uttarankhand Sanskrit University, situated in the auspicious and divine town of Haridwar, It gives me great pleasure to welcome and pay my respects to the congregated scholars, lovers of Sanskrit, teachers and students.
In this land of the lord of the mountains and the blessed Bhagirathi river, the auspicious stream of Sanskrit and its traditions have been flowing for many ages. In fact, India's own culture and traditions are firmly said to be linked to the Himalayas and the Ganges. Eleven years ago, the Government of the State of Uttarakhand has established this university of Sanskrit to safeguard the timeless heritage of Sanskrit and to present to the World the entire glory of Sanskrit in all its divinity and greatness.
Our Hon'ble Governor, His Excellency Shri Krishna Kant Pal, our Hon'ble Chief Minister and Hon'ble Sanskrit Education Minister have a keen interest in ensuring the expeditious establishment of the Sanskrit language on the global stage. Our Hon'ble Chancellor is deeply interested to provide a meaningful and rightful foundation to this World renowned University to achieve this purpose.
I humbly appeal to all the Professors, teachers, non-teaching staff and students of this University and its affiliated colleges, and to all my friends who have an interest and love for Sanskrit and its culture, that they devote their energies, abilities and available means and strength so that we can ensure that the flag of Sanskrit continues to fly high among the highest peaks of the Himalayas.
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